हम अक्सर देखते है कि जीवन की परेशानियों से निजात पाने के लिए ज्योतिष,मन्त्र,तंत्र,यंत्र,टोटके,पूजा जैसे विभिन्न प्रकल्प प्रयोग में लिए जाते है।पूजा और मंत्रो के जाप से इतना तो निश्चित प्रभाव होता है कि उस व्यक्ति के अंदर का भय कुछ कम हो जाता है क्योंकि उसके मन में कही न कही एक विश्वास बन जाता है कि इस कठिनाई का समाधान उसके आराध्य देव निश्चित रुप से करेंगे अर्थात तब वो खुद को अकेला नहीं समझता।
कई बार हम देखते है कि लोग कठिनाइयों के शमन के लिए सात्विक मार्ग से हटकर तामसिक मार्ग पर चल पड़ते है-इतना ही नही शत्रु बाधा को हटाने के चक्कर में शत्रु की जिंदगी के हरण के प्रयोग तक भी चले जाते है
अर्थात पिछले पाप कर्मों की समस्या के समाधान के लिए नए पाप कर्म और इस तरह आगे के जीवन के लिए खुद ब खुद परेशानियों को आमंत्रण देने का अनजाने गुनाह सा कर बैठते है।
इस विषय पर कभी अलग से कुछ विस्तार में बात करेंगे पर यह सब जानकारी देने का उद्देश्य यह था कि परेशानियों को दूर करने के उपाय बेशक कीजिये पर उनका मार्ग,उनकी प्रक्रिया को जान लीजिए नहीं तो आज का समाधान फिर कल की परेशानी बन सकता है।
चलिए लौट कर आते है आज के विषय पर कि क्या कर्मफल को बदला जा सकता है?
मेरा अभिमत हाँ भी है और ना भी--क्योकि शास्त्र कहते है कि हमारे कर्मो में भी वर्गीकरण होता है उनमें कुछ कर्म *निकाचित* और कुछ *संचित * होते है और इनमें संचित कर्मो के परिणामो को बाहरी क्रिया प्रक्रिया जैसे पूजा,मन्त्र साधना,यंत्र आराधना, दान व् कुछ टोटको की प्रचलित प्रक्रियाओं से बाधक ग्रह की शान्ति करके बदला जा सकता है पर जो कर्म निकाचित रूप से हमारे दिल से गहरे बंधे होते है उनको पूर्ण रूप से ही भुगतना पड़ता है अर्थात इन कर्मो के परिणामो को बदलने की कोई बाहरी प्रक्रिया काम नहीं आती।
शास्त्र ज्ञानी कहते है कि मानसिक रूप से राग-द्वेष से बंधे कर्म के परिणामो में कोई बदलाव नहीं लाया जा सकता -चाहे आप कितनी भी पूजा और बाहरी प्रक्रिया ही क्यों न कर ले -ये कर्म पूर्ण रूप से भोगने ही पड़ते है।
कर्म बदले कैसे जा सकते है?
इस विषय पर चर्चा अगली पोस्ट में करेंगे-----
आभार।
संजय सनम
कई बार हम देखते है कि लोग कठिनाइयों के शमन के लिए सात्विक मार्ग से हटकर तामसिक मार्ग पर चल पड़ते है-इतना ही नही शत्रु बाधा को हटाने के चक्कर में शत्रु की जिंदगी के हरण के प्रयोग तक भी चले जाते है
अर्थात पिछले पाप कर्मों की समस्या के समाधान के लिए नए पाप कर्म और इस तरह आगे के जीवन के लिए खुद ब खुद परेशानियों को आमंत्रण देने का अनजाने गुनाह सा कर बैठते है।
इस विषय पर कभी अलग से कुछ विस्तार में बात करेंगे पर यह सब जानकारी देने का उद्देश्य यह था कि परेशानियों को दूर करने के उपाय बेशक कीजिये पर उनका मार्ग,उनकी प्रक्रिया को जान लीजिए नहीं तो आज का समाधान फिर कल की परेशानी बन सकता है।
चलिए लौट कर आते है आज के विषय पर कि क्या कर्मफल को बदला जा सकता है?
मेरा अभिमत हाँ भी है और ना भी--क्योकि शास्त्र कहते है कि हमारे कर्मो में भी वर्गीकरण होता है उनमें कुछ कर्म *निकाचित* और कुछ *संचित * होते है और इनमें संचित कर्मो के परिणामो को बाहरी क्रिया प्रक्रिया जैसे पूजा,मन्त्र साधना,यंत्र आराधना, दान व् कुछ टोटको की प्रचलित प्रक्रियाओं से बाधक ग्रह की शान्ति करके बदला जा सकता है पर जो कर्म निकाचित रूप से हमारे दिल से गहरे बंधे होते है उनको पूर्ण रूप से ही भुगतना पड़ता है अर्थात इन कर्मो के परिणामो को बदलने की कोई बाहरी प्रक्रिया काम नहीं आती।
शास्त्र ज्ञानी कहते है कि मानसिक रूप से राग-द्वेष से बंधे कर्म के परिणामो में कोई बदलाव नहीं लाया जा सकता -चाहे आप कितनी भी पूजा और बाहरी प्रक्रिया ही क्यों न कर ले -ये कर्म पूर्ण रूप से भोगने ही पड़ते है।
कर्म बदले कैसे जा सकते है?
इस विषय पर चर्चा अगली पोस्ट में करेंगे-----
आभार।
संजय सनम
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