पिछली दो पोस्ट में हमने किस्मत अर्थात तकदीर के विभिन्न पहलूओ पर बात की और वहां से चलते चलते हम कर्म तक आये---आइये कर्म के बारे में भी थोड़ी चर्चा कर ले क्योकि हम जिसे अपनी किस्मत या तक़दीर कहते है वो आती इन कर्मो से ही है अर्थात तकदीर की जमीन या फिर यु कहिये कि इनका निर्माण ,जन्म कर्मो से ही होता है।
अब कर्म क्या होते है?
जो हम करते है अच्छे या बुरे काम---क्या उनको कर्म कहते है?
जी नहीं।वे कर्म नहीं बल्कि क्रिया होती है जो हम सोचते , कल्पना करते है वो कर्म होते है।
कर्म हमारी सोच,विचार अर्थात मन के भाव से ही शुरू हो जाता है-हमारी हर सोच ,विचार,भावना,कामना,चाह ये सब हमारे कर्मो की गणना में आ जाता है--किसी के प्रति दुआ या बददुआ ये सब कर्म हो जाती है।
अर्थात कर्म हमारी मानसिक स्थिति के आधार पर हमारी तलपट को तैयार करते है और जब उस भावना विचार को क्रियान्वित किया जाता है तब उसमें क्रिया जुड़ जाती है।
शास्त्र कहते है कि मन की भावना में अगर किसी को मारने का भाव आ गया तब हमारे खाते में खून या कत्ल का कर्म बन गया और इस पाप के भागीदार बिना उसको मारे भी हो गए। सोचना,विचारना ही कर्म के क्षेत्र में आ जाता है कुछ करना तो क्रिया में हो जाता है।
इसका सीधा अर्थ साफ है कि अच्छी सोच,अच्छे विचार हमारे लिए अच्छे कर्म बनते है और ये अच्छी तकदीर या किस्मत का निर्माण करते है।
इसलिए एक बात साफ है कि किस्मत को अगर मस्त बनाना है तो अच्छे विचार,सद्भाव,प्यार,परोपकार के विचार रखने चाहिए क्योंकि तब आपके खाते में अच्छे कर्मों की जोड़ बढ़ने लगे जाती है और जब इस फ़ाइल के खुलने का नम्बर आता है तब एक के बाद एक कामयाबी, की कतारे खड़ी दिखती है।
इसलिए कर्म और क्रिया के बीच के भेद को सबसे पहले समझना जरूरी है--याद रखिए पाप किसी को जान से मारने से ही नहीं लगता बल्कि यह सोचने मात्र से आप खून के पाप से रंग जाते है और यह फ़ाइल जब आपके जीवन में खुलती है तब इन पाप कर्मो की सजा मिलती है इसलिए आवश्यक है कि कर्म को समझते हुए मानसिक भाव को हमेशा शुद्ध बनाये रखे ताकि कर्म परिणामो की उस बुरी कसौटी से बच सके।
अब कर्म क्या होते है?
जो हम करते है अच्छे या बुरे काम---क्या उनको कर्म कहते है?
जी नहीं।वे कर्म नहीं बल्कि क्रिया होती है जो हम सोचते , कल्पना करते है वो कर्म होते है।
कर्म हमारी सोच,विचार अर्थात मन के भाव से ही शुरू हो जाता है-हमारी हर सोच ,विचार,भावना,कामना,चाह ये सब हमारे कर्मो की गणना में आ जाता है--किसी के प्रति दुआ या बददुआ ये सब कर्म हो जाती है।
अर्थात कर्म हमारी मानसिक स्थिति के आधार पर हमारी तलपट को तैयार करते है और जब उस भावना विचार को क्रियान्वित किया जाता है तब उसमें क्रिया जुड़ जाती है।
शास्त्र कहते है कि मन की भावना में अगर किसी को मारने का भाव आ गया तब हमारे खाते में खून या कत्ल का कर्म बन गया और इस पाप के भागीदार बिना उसको मारे भी हो गए। सोचना,विचारना ही कर्म के क्षेत्र में आ जाता है कुछ करना तो क्रिया में हो जाता है।
इसका सीधा अर्थ साफ है कि अच्छी सोच,अच्छे विचार हमारे लिए अच्छे कर्म बनते है और ये अच्छी तकदीर या किस्मत का निर्माण करते है।
इसलिए एक बात साफ है कि किस्मत को अगर मस्त बनाना है तो अच्छे विचार,सद्भाव,प्यार,परोपकार के विचार रखने चाहिए क्योंकि तब आपके खाते में अच्छे कर्मों की जोड़ बढ़ने लगे जाती है और जब इस फ़ाइल के खुलने का नम्बर आता है तब एक के बाद एक कामयाबी, की कतारे खड़ी दिखती है।
इसलिए कर्म और क्रिया के बीच के भेद को सबसे पहले समझना जरूरी है--याद रखिए पाप किसी को जान से मारने से ही नहीं लगता बल्कि यह सोचने मात्र से आप खून के पाप से रंग जाते है और यह फ़ाइल जब आपके जीवन में खुलती है तब इन पाप कर्मो की सजा मिलती है इसलिए आवश्यक है कि कर्म को समझते हुए मानसिक भाव को हमेशा शुद्ध बनाये रखे ताकि कर्म परिणामो की उस बुरी कसौटी से बच सके।
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