सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
मेष लग्न के कारक ग्रहों को जानिये..
:संजय सनम(ज्योतिष परामर्शक)
संर्पक सूत्र:72780 27381
हर लग्न के कारक,अकारक,मारक,बाधक ग्रह होते है जो ग्रह कारक होते है वे जातक पर अपना शुभ प्रभाव देते है विशेषकर अपनी महादशा,अंतर्दशा,प्रत्यंतर,सूक्ष्म अंतर,व प्राण अंतर की दशा में जब भी आते है तब जातक को अपने कारकत्व का लाभ दे जाते है फिर वो सेहत,सम्पति,शादी,बच्चे,जमीन जायदाद,उच्च शिक्षा,अच्छी नोकरी,प्रमोशन,भोगविलास, विदेश यात्रा,मांगलिक उत्सव,लोकप्रियता अर्थात मान सम्मान अर्थात शुभ फल अभीष्ठ सिद्धि दे देते है इसके विपरीत जब मारक व बाधक ग्रहों की दशा किसी भी रूप में आती है तब जातक को नकारात्मक परिणाम अर्थात मुश्किलों से निकलना पड़ता है।
अब सवाल यह है कि मेष लग्न के जातकों के लिए अति शुभ योगकारी ग्रह कौनसे है जो जातक के लिए विशेष शुभ फल प्रदान करने में सक्षम होते है।
एक बात हमेशा याद रखिये हर लग्न का मालिक सबसे अधिक शुभ होता है बशर्ते जन्मांग चक्र में उसकी स्थिति,नक्षत्रों का समीकरण ठीक हो क्योकि वो स्वयं शरीर होता है और इसलिए सबसे प्रमुख भूमिका उसकी ही होती है ...जान है तो जहान है इसलिए अगर लग्न मजबूत है तो फिर जन्मांग चक्र में अन्य दोष भी हो तब भी व्यक्ति स्वस्थ जीवन जी सकता है क्योंकि लग्न भाव आपका शरीर,आपकी पर्सनल्टी,औऱ आपके समग्र जीवन की झलक इसमे होती है अगर आपके लग्न भाव का अधिपति की स्थिति जन्मांग चक्र में अच्छी है तब फिर आपका शरीर स्वस्थ रहेगा,आप ऊर्जा से परिपूर्ण रहेंगे भले ही आपके पास धन का भंडारण न हो फिर भी आप जीवनयापन बहुत अच्छी तरह से मान सम्मान के साथ जीते हुए करने में समर्थ रहेंगे।आपके अंदर कर्मशीलता जबरदस्त रहेगी औऱ उसका फल चाहे विलंब से ही क्यों न मिले पर आपको उपलब्धि फिर भी मिलेगी।इसलिए किसी भी जन्म कुंडली मे उसका लग्न अर्थात पहला भाव का मालिक बली होना आवश्यक है।मेष लग्न में लग्न का मालिक मंगल होता है जो कि लग्न के साथ अष्टम अर्थात दुष्ट स्थान का भी मालिक होता है पर लग्नेश को अष्टमेश का दोष नही लगता इसलिए अष्टम भावस्थ मंगल भी मेष लग्न में अशुभ नही होता। मंगल की सबसे अच्छी स्थिति वैदिक सिद्धान्त के अनुसार तो लग्न,पंचम व नवे भाव मे कही जा सकती है पर नक्षत्र ज्योतिष से मंगल के नक्षत्र अगर 1,2,6,10,11 के भाव मे हो तब फिर जातक विशेष समृद्ध होता है।
मेष लग्न में चंद्रमा केंद्र स्थान चतुर्थ का मालिक होने व मंगल चन्द्रमा का योग लक्ष्मी योग की सृष्टि करने की वजह से शुभ माना गया है अगर मंगल चन्द्रमा एक साथ लग्न या चतुर्थ भाव मे उपस्थित हो तो वैदिक ज्योतिष के अनुसार यह विशेष योग बनता है । चतुर्थ भाव मे मंगल का नीच भंग होकर राज योग का निर्माण करता है।
सूर्य मेष लग्न में त्रिकोण भावअर्थात पंचम का मालिक होने तथा मंगल के साथ मित्रवत भाव की वजह से अति योगकारी होता है तथा दशा भुक्ति में श्रेष्ठ परिणाम देता है अगर जन्मांग चक्र में उसकी स्थिति भाव तथा नक्षत्र के रूप में सही होती है।
गुरु ग्रह अर्थात देव गुरु भी नवम अर्थात भाग्य व द्वादश भाव का मालिक होने व मंगल के साथ मित्रता होने से गुरु ग्रह की दशा युति भी जातक के लिए श्रेष्ठ होती है।यह स्थिति उच्च शिक्षा, विदेश लाभ,अध्यापन के प्रोफेसन,परामर्शक के रूप में लाभ प्राप्त कर सकता है।
मेष लग्न के जातक के लिए चतुर्थ भाव चन्द्रमा अर्थात माता का भाव तथा नवम अर्थात पिता,गुरु,भाग्य भाग्य भाव का मालिक गुरु होता है तथा सूर्य भी पंचम त्रिकोण का मालिक अर्थात पिता इन तीनो का प्रभाव मुख्य कहा जा सकता है अर्थात मेष लग्न का जातक माता,पिता,गुरु की सेवा करे तो इन ग्रहों के सकारात्मक परिणाम मिलते है।
अगले आलेख में बुध,शुक्र,व शनि का मेष लग्न के जातक पर क्या प्रभाव पड़ता है!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें