ऋणानुबन्ध कैसे चलता है!
ऋणानुबंध का अर्थ होता है जिससे आपका ऋण बंधा या ऋण संबंध है। यदि आपने किसी से अपने पिछले जन्म में किसी भी प्रकार से कोई कर्ज या ऋण लिया है और आप उसे समय पर चुका नहीं पाए हैं, तो आपको इस जन्म में वह चुकाना होगा। जिसका आपने कर्ज नहीं चुकाया है।
पिछले जन्म के संचित कर्म के आधार से इस जन्म में पितृऋण, मातृऋण, संतान ऋण, आदि द्वारा चुकाना होता है ।इस जन्म में हम जिसके साथ अपना संबंध रखते हैं जिस रूप में रखते हैं उनके साथ जो भी लेना देना होता है वह कर्म हमारे ऋणानुबंधन आधार पर तय होता है।यह क्रम जन्म जन्मांतर तक रहता है जब तक हमें मोक्ष नहीं प्राप्त होता।कई बार ऐसा सुना जाता है कि पिछले जन्म के कर्म है जो हम इस जन्म में भुगत रहे।
ऋणानुबन्ध शब्द में ही अर्थ छिपा है इसका एक उदाहरण रामायण में वनवास के दौरान सीता जी को प्यास लगी ।चारो ओर जंगल ही जंगल श्री राम जी ने कुदरत से प्रार्थना की है वनराज जहा पानी हो वहाँ का मार्ग बताए।तभी वहां एक मयूर ने आकर श्री राम से कहा आगे थोड़ी दूरी पर एक जलाशय है।चलो मैं आपका मार्ग प्रदर्शक बनता हु।मार्ग में हमारी भूलचूक होनी का भय बना रहैगा।तब मयूर ने कहा मैं उड़ता हुआ जाऊँगा ओर आप पैदल जाना।मैं मार्ग में अपना एक एक पंख गिराता हुआ जाऊँगा ।उसके सहारे आप जलाशय तक पहुच जाएगा।ओर यह बात सब जानते हैं कि मयूर के पंख एक विशेष समय और विशेष ऋतु में ही बिखरते है।अगर यह अपनी इच्छा विरुद्ध पंख को बिखेरेगा तो मयूर की मौत हो जाएगी।ओर वही हुआ ।अंत मे जब मोर अपनी अंतिम सांस ले रहा था तो उसने कहा कि वह कितना भाग्य शाली है कि जो जगत की प्यास बुझाते है आज मैं उनकी प्यास बुझाने का अवसर प्राप्त हुआ।मेरा जीवन धन्य हो गया।
अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नही है तब श्री राम ने मयूर से कहा कि तुमनें जो मेरे लिए मोर पंख बिखेर कर मुझपर जो ऋणानुबंधन चढ़ाया है।मैं उस ऋण का अगले जन्म में अपने सिर पर धारण करके अवश्ये चुकाऊंगा।अगले जन्म में कृष्ण अवतार के समय कृष्ण अपने माथे पर मोर पंख धारण कर वचनानुसार उस मयूर का ऋण उतार सका इसका अर्थ यह है कि अगर भगवान को अपना ऋण उतारने के लिए अगला जन्म लयणा पड़ता है तो हम तो मानव है।न जाने हम कितने ऋणानुबंध से बंधय हुए है।उसे उतरने मैं हमय कई जन्म लग सकते हैं।इसलिए हमको अपना जो भी भला करना है इस जन्म मैं करना चाहिए ।
ऋणानुबंध मैं मुक्ति पाने हेतु आत्मसाक्षात्कार द्वारा ध्यान मार्ग अपनाकर ,भक्ति करके ,कर सकते हैं।और एक खास बात जरूरी नही की हम दुबारा जन्म लीकर ही ऋण मुक्त हो सकते है।इसी जन्म मैं भी ऋण मुक्त हो सकतै है जैसा कि अभी आपने महाभारत में देखा होगा ।दुर्योधन अग्नि स्नान करता है कुछ समय क्लेश स्नान भी करता है जैसा कि हम स्नान करते ह अपने शरीर को स्वछ रखने के लिए।परंतु आत्मा को शुद्ध और ऋणानुबन्ध क्रिया से मुक्त करनय के लिए अग्नि स्नान,क्लेश स्नान भी करते है योगी ओर भोगीइसी जन्म में ऋण युक्त हो जाते हैं।
लिखने को ओर भी बहूत कुछ है।पर बस इतना ही आज अगर मैं इस ब्लॉग में अपने विचार लिख रही हूँ तो आप सब के साथ भी कोई न कोई पिछले जन्म का संबंध तो होगा ही
मेरे पिता का भी कोई न कोई मुझ पर ऋण बाकी रह गया होगा जो मैं ज्योतिष के माध्यम से उनके ऋण को उतार रही हूँ मेने कभी नही सोचा था कि अपने पिता के कार्ये(मेरे पिता एक विद्वान ज्योतिषी ओर प्रचारक ) थे।और मैं उनकी बेटी होकर उनके विषय को बढ़ाया ओर प्रसिद्धि भी प्राप्त की औऱ अपने पिता के जो क्लाइंट थे वो अब मेरे क्लाइंट है।वो खुद तो नही है पर उनके बच्चे मेरे क्लाइंट है औऱ मुझे वो वैसा सम्मान देते हैं।अब यह तो नही पता कौन किसका ऋण उतार रहा है !पर हम सब एक ही डोर में कब कैसे बंध गए!
अब मै दूसरे बिंदु ज्योतिषीय योग पर अपनी बात रखूंगी........जब पंचम भाव का संबंध षष्ठ,अष्टम नवम और एकादश भाव से होता है तो ऋणानुबंधन होता है,,,,,क्योंकि पंचम भाव को हम पूर्वजन्म कृत कार्य का भाव मानते है
नवम भाव को पूर्व जन्म का भावत भावम भाव या भाग्य भाव को बताता है
एकादश भाव इच्छा पूर्ति का भाव होने से महत्वपूर्ण है
इन सभी का बताए गए भावों से संबंध ऋणानुबंधन होता है
इन भावों का जितना ज्यादा संबंध पंचम भाव से होगा ,,,अगर प्रतिकूल प्रभाव है तो यह योग बहुत पेनफुल होगा
अगर शुभ प्रभाव में है तो यह आपकी जिंदगी को खुशनुमा और यादगार बना देता है
इस योग के कारण ही हमको जीवन के अलग अलग पड़ाव पर लोग मिलते जाते हैं जिनके साथ हमारा आत्मिक संबंध बन जाता है,,,,,
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